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कभी कभी अपनी ही दुनिया से डर लगता है
ख़ामोशी और सन्नाटे क बीच अपने जज़्बातों को तैरते हुए देखना,
इतना खौफनाक क्यूँ लगता है!
कभी कभी लगता है के खोल दूं दरवाज़े,
आने दूं उस क़िरण को जो ये अंधियारा मिटा सकती है
आने दूं उस सरसराती हवा को जो इस सन्नाटे को चीर सकती है
आने दूं उन हँसी के ठहाकों को जो इस पल की ख़ामोशी डोर कर सकते हैं
पर अगले ही पल डर लगता है
यह मैं कहाँ बहे जा रही हूँ,
सच्चाई का बोध सा होने लगता है
ये किरण रोशनी देने नहीं जलाने आई है
ये सरसराती हवा जड़ से उखाड़ने आई है
ये  हँसी के ठहाके खुशियाँ बाटने के नहीं किसी पे तंच कसने के हैं
नहीं नहीं

इससे तो मैं अपनी ही दुनिया में ठीक हूँ
यह मुझे मेरे अस्तित्व का बोध कराती है
नहीं जाना मुझे उस कोलाहल में चन्द लम्हों के सुख के लिए
और यूँ मैने अपना आँचल हमेशा के लिए समेट लिया!

Author: aawarahun

I am a Mechanical Engineer by degree, Key Clients Manager by profession. Automobile entusiast, a pationate rider. I love to travel, adventure sports, movies, listining to music. In search of Good Food.. Always!! :)

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